Saturday, May 19, 2012

पाठक: 1963


Friendship... is not something you learn in school. But if you haven't learned the meaning of friendship, you really haven't learned anything. :Muhammad Ali
The secret to friendship is being a good listener
कभी-कभी ऐसा लगता है कि हम एक समय की खिची हुई एलास्टिक डोरे पर स्थित हों. डोर थोड़ा ज्यादा खिची तो सब कुछ स्लो मोशन में होता महसूस होता है और डोर संकुचित हुई तो वर्षों की कहानी कुछ दिनों में सिमट सी जाती है. देखिये, मैंने एक वाक्य में भविष्य में चार आयामी ( स्पेस-टाइम) अटॉमिक थ्योरी की जगह बहुआयामी स्ट्रिंग थ्योरी की प्रमुख परिकल्पना बता दी.  आज लगता है जैसे 1961 से 1966 का समय सिमट कर कुछ दिनों का हो गया है. एक कैनवास में दूसरा कैनवास होच-पोच सा हो गया है. कौन सी घटना पहले  हुई और कौन बाद में यह ज्यादा मायने नहीं रखती.
1963 में मैंने अपना ग्रेजुएशन का पहला साल रांची कॉलेज के नए भवन में आरम्भ किया. एक-एक क्लास रूम 200 लड़कों को बिठा सकता था. गैलेरीनुमा हॉल में मुझे दाहिनी ओर की तीसरी बेंच बहुत भाती थी. पर कुछ लड़कों के पहले बैठने की वजह से ज्यादातर वह बेंच मेरे पहुँचने के पहले भर जाया करती थी. स्पर्धा में मेरी तरह 5 फीट 1 इंच के दो लड़के और भी थे.
एक दिन मैंने ज्यादा फूर्ती दिखाई और उनमे से एक को धकियाते हुए एक बची जगह पर बैठ गया. उस बेचारे को मेरे पीछे वाली सीट पर बैठना पड़ा. उस दिन जब घर आकर कपड़े बदलने लगा तो देखा कि मेरी पीठ पर स्याही की कुछ बूँदें थी. मैं समझ गया कि ये करतूत उसी पीछे बैठे लड़के की होगी.
अगले दिन मैं सोच-समझ कर उस लड़के से एक पल पीछे रहा. वह लड़का तेज़ी से तीसरी बेंच पर बैठ कर मुझे मुस्कुराते हुए पीछे जाता देखता रहा. मैं उसके पीछे वाली सीट पर बैठ गया. मैं उस दिन दो पेन लाया था.
दूसरे दिन मेरे मित्र लक्ष्मी ने मुझे बताया कि उस लड़के की शर्ट और बनियान दोनों स्याही से पूरी तरह रंग गयी थी और उसे घर में काफी सुनना पड़ा था. साथ ही उसने यह भी बताया कि वह प्रोफेसर पाठक का लड़का है. पाठक सर, सान्याल-भागीरथ सिंह-पाठक त्रिभुज के सिरमौर थे जिनके बूते 2000 लड़कों का कॉलेज शांति से चलता था. उनमे से कोई भी कारिडोर में निकल पड़ता तो पूरी लम्बाई में सन्नाटा छा जाता. मैं किसी भी तरह उस लड़के से माफ़ी मांग कर दोस्ती करना चाहता था.  लौटते समय वह कॉलेज के बाहर एक पेड़ के पीछे दिखाई दिया. मेरे वहाँ पहुँचने के पहले ही उसने मुझसे हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ा दिया. उसका नाम शिव कुमार पाठक था. उसके साथ ही मेरी दोस्ती उसके साथ रहने वाले लड़के से भी हो गयी. संयोग से उस लड़के का नाम भी प्रकाश था. प्रकाश कुमार.
उसके बाद के तीन साल हमलोगों ने ज्यादातर साथ-साथ बिताए. साथ पढ़ने के हमलोग का होटल और फिल्म देखने का प्रोग्राम भी बनता. कॉलेज के तरफ से हमलोग नेतरहाट भी गए. पहली जनवरी को तो हमलोग जोन्हा फ़ाल्स ही जाते. ब्रेड, जैम, कंडेंस्ड मिल्क का डिब्बा, बिस्कुट, चाय-काफी बनाने का सामान और एक कैमरा. एक पैसेंजर ट्रेन थी जो साढ़े नौ बजे सुबह रांची से खुलती थी , एक घंटे में गौतम धारा स्टेशन उतारती थी जहाँ से जोन्हा फ़ाल्स ३ किलोमीटर दूर था और शाम को सात बजते-बजते रांची पहुंचा देती थी.
जब कभी हम तीनो या दोनों साइकिल पर कहीं जा रहे होते तब पाठक हमेंशा एक ही गाना गुनगुनाया करता ,” है अपना दिल तो आवारा...”. जब कभी हमलोग कहीं पहाड़ी पर बैठ कर सूर्यास्त देख रहे होते तो उसकी जुबान पर ये गाना होता,”कभी खुद पे कभी हालात पर रोना आया”.  हटिया रेलवे प्लेटफार्म हमलोग उस समय इक्का-दुक्का आने वाली ट्रेन देखने के साथ-साथ छिपकर सिगरेट भी पीने के लिए जाते. उस समय उसके जुबान पर ये गाना होता,”मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया” मतलब ये कि उसे विश्वास सा  हो गया था कि वह देवानंद हो गया है.
हमलोगों का बचपना अभी गया नहीं था और इस बचपने को हमारे प्रोफेसर और ज्यादा उम्र के सहपाठी मजा भी लेते और झेलते भी. ये दोस्ती , दोस्ती की पिटी-पिटाई लाइन पर थी. पर हमलोगों को तीन-तीन माताओं का प्यार भी मिला उन दिनों.
पाठक की माँ मुझे बहुत सरल और भोली लगती थीं. फिट-फिट गोरी, थोड़ी नाटी, बहुत सुन्दर और आन्चल हमेशा सर पर. सुबह का कॉलेज था. एक दिन कॉलेज में देर हो गई. भूख से हम तीनों का बुरा हाल था. घर लौटने के रास्ते में पाठक का घर पड़ता था या यों कहे की उसका घर कॉलेज से एक मील दूर था पर मेरा घर सात मील दूर. मैं ज्यादातर सिटी बस से आता-जाता था. उस दिन पाठक जिद करके घर ले गया. पाठक माँ प्रकाश कुमार को पहले से जानती थी. मुझे पहले बार देखा था. उनके पूछने के पहले ही पाठक ने एक सांस में बता दिया की मेरा नाम प्रकाश है, राजपूत हूँ और पिताजी मजिस्ट्रेट हैं. अब पाठक माँ ने क्या कहा उस पर गौर कीजिये .
“ देखो बाबू लोग ! ई घर ब्राह्मण का है. बुरा मानने का कोई बात नहीं है. खाना खाकर बर्तन बाहर जाकर धोकर ले आना. जमीन पर जो भी झूठा गिरेगा उसे उठा कर पानी से जमीन पोछ देना. सबलोग हाथ-पांव धोकर पूरब मुंह करके बैठ जाओ. “ और उसके बाद हमलोगों को अलग-अलग थाली में खाना देकर दरवाजे का ओट लेकर खड़ीं हो गयी. जैसे ही पहला कौर मुंह में गया, बोलीं,” हमलोगों के घर में लहसुन-प्याज नहीं पड़ता है. ऐसा ही सादा खाना बनता है. भोला (पाठक के घर का नाम ) को बैगन अच्छा नहीं लगता है , डरता है की बैगन की तरह काले हो जायंगे इसीलिए उसको बैगन नहीं दियें हैं.”
खाने में बहुत स्वाद था उसपर हमलोग सुबह छ बजे घर से निकले हुए. उस दिन जरूर पाठक के घर में दोबारा खाना बना होगा. ऐसा मैंने पाठक को कहा . जवाब मिला की उसके घर में हमेशा एक-दो मेहमान आते रहते हैं इसलिए माँ ज्यादा खाना बना कर रखती है. सप्ताह में एक-दो बार तो हमलोग अवश्य पाठक के घर खाना खाते. बाद में पाठक माँ हमलोगों की पसंद  जानकर वैसा ही कुछ बना कर रखतीं.
एक साल बाद जब हम तीनो दोस्त नेतरहाट दो दिनों के लिए गए तब पाठक माँ ने मुझे दो रूपये दिए और कहा की भोला के हाथ में देंगे तो फिजूलखर्ची कर देगा. बाद में लौटने पर, मैंने वो रूपये पाठक माँ को लौटा दिया. ये बात पाठक को शायद नहीं मालूम है.
प्रकाश की माँ एकदम पुलिस इंस्पेक्टर की श्रीमती थी. उसके घर हमलोग जब भी जाते तो जोइंट स्टडी का बहाना करके. जाते ही सवालों की झड़ी लग जाती. “ इतना देर कहाँ थे ? विनय तो एक घंटे पहले लौट आया? साथ में कौन है? चौकड़ी में बस विनय का कमी रह गया है, इत्यादि. मजेदार बात ये की खाना खाना उस घर के कानून में से एक था, पर एक थाली में. प्रकाश के घर ज्यादातर दो-तीन घंटे बिताकर चार बजे के बाद हमलोग लौटते. एक तो बाहर का माहौल ठंडा जाता , दूसरे हमलोगों के पिताजी लोगों के ऑफिस/कॉलेज से लौटने का वक्त हो जाता.
मेरे पिताजी बहुत गुस्सेल प्रकृति के थे. मेरा घर दूर भी पड़ता था. इसलिए पाठक कभी अकेले या कभी प्रकाश के साथ महीने- दो महीने में ही आता. मेरी माँ से उनलोगों की मुलाकात उस दरम्यान एक-दो बार ही हुई होगी. हमलोगों के 12 जनों के परिवार में ऐसे भी माँ को सांस लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती. पाठक को मेरी माँ का बनाया हुआ आलू का पराठा अच्छा लगता जो मैं कभी-कभी ले जाया करता और कॉलेज कैंटीन में बैठ कर अकेले या दोस्तों के साथ खाया करता. पाठक को माँ का बनाया हुआ बंधगोभी की सब्जी इसलिए बहुत अच्छी लगती क्योंकि उसमे गोटा लहसुन पड़ा होता. मेरे पिताजी के साये से भी वे लोग डरते और माँ से सहमते. मेरे दोस्तों पर सुभद्रा कुमारी चौहान का बहुत मान था और वह माँ की मौसी थीं.
पाठक और मैंने फिजिक्स में मास्टर किया एवं प्रकाश ने सिविल एन्जिन्यिरिंग.
पाठक स्वादिष्ट खाने का शौक़ीन है खासकर मिठाईयों का. 1995 के आस-पास, मैं ओफिस के किसी काम से पटना आया था. उससे मिलने शेखपुरा में उसके ऑफिस गया. लौटते वक्त वह चार मील दूर पैदल आया और रास्ते भर रुक-रुक कर तरह-तरह के व्यंजन खाता-खिलाता रहा. साथ में घर के लिए खाजा और तिलकुट लेता आया. उसका ये शौक अभीतक बरकरार है.
पाठक बहुत बोलता है पर अच्छा बोलता है. इसकी एक मिसाल भुलाये नहीं भूलती. दिसम्बर,2007 में हमलोग पटना में अजय भैया के बड़े लड़के अपु की शादी में जमा हुए थे. रात भर की जगान के बाद दूसरे दिन झपकी लेने का मौका नहीं मिल रहा था. हॉल में करीब १० लोग बैठे बतिया रहे थी. दिन के तीन बज रहे थे. उस समय तक बोलने की बागडोर पाठक ने सम्हाल ली थी. वह बोल रहा था और सभी एकाग्र सुन रहे थे. शायद बात ट्रेनों के आधुनिककरण पर थी. झपकी के बीच मैं भी सर हिला रहा था. मुझे नीद आ गयी. किसी ने आकर जगाया और कहा की साढ़े सात बज रहे हैं , ट्रेन छूट जायेगी. मैंने देखा , कोई बीस से ज्यादा लोग बैठे पाठक का लालू-नितीश के समीकरण पर बड़े ध्यान से व्याख्यान सुन रहे थे.
काश, उसने ऐसी ही अपने धैर्य पर लगाम कसी होती.
प्रकाश से अंतिम मुलाकात 1967 में हुई थी.

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