October,2007 में एक दिन अजय भैया का पटना एअरपोर्ट से फोन आया. वे किसी से मेरी बात कराना चाहते थे. दूसरी तरफ से आवाज़ आई,” क्या प्रकाश ! पहचान रहे हो ? “ मैंने तपाक से जवाब दिया,” क्या सुनील ? दूसरे तरफ से आवाज़ आने में समय लगा,” My Goodness ! तुमने पहचान लिया ? मैं आज रांची आकर सबसे पहले तुमसे मिलूँगा.” सचमुच, 50 वर्षों बाद किसी कि आवाज़ तुरंत पहचान लेना किसी के लिए भी आश्चर्य का विषय हो सकता है. मेरे लिए नहीं क्योंकि मैं सुनील के साथ घटी कुछ मजेदार घटनाएँ अपने दोस्तों और साथियों को सुनाता रहता था. और हाँ , बीच में अजय भैया ने बताया था कि सुनील ने भी स्टेट बैंक ज्वाइन किया है. शायद यही कारण रहा होगा मेरी यादाश्त की मजबूती का.
बचपन में और शायद हर समय लोग ऐसे लोगों की तलाश में रहते
है जो उनके पलों में रंग भर दे. आखिर कौन मुस्कुराते हुए जीना नहीं चाहता .
आज आप जिसे किंडर गार्टेन और प्रीपरेटरी क्लासेस कहते है
वैसी ही एक गणेश पाठशाला में मेरे दादा ने मेरा एडमिशन पहली कक्षा में करा दिया.
सन 1953 में मैं 6 वर्ष का था. एक मंजिला स्कूल, तीन तरफ क्लास रूम्स, बड़ा
सा आंगन , आँगन के अंत में शेडेड लंच एरिया और उसके कोने पर टॉयलेट. क्लासेस का
दरवाजा आँगन की ओर खुलता था
सात वर्ष अच्छी उम्र होती है. साथ में उस पाठशाला में
लड़कियां भी पढ़ती थीं. सुनील मेरी कक्षा में था और उसका घर स्कूल से एक किलोमीटर
दूर जबकि मेरा रास्ते में पड़ता था. इसलिए लौटते वक्त तो आधी दूर तक रोज का साथ
रहता था.
एक दिन कक्षा में सुनील अचानक उठा और बड़ी शालीनता से
टॉयलेट जाने कि इजाजत मांगी. जब टॉयलेट जाने की शुरुआत होती तो नंबर लग जाया करता
था. इसलिए टीचर ने हिदायत दी कि तीन से ज्यादा को इज़ाज़त नहीं मिलेगी. सुनील उठा और
बीच आँगन में खडा होकर एक-एक कपड़े उतरने लगा. ऐसा पहले कभी नही हुआ था. बच्चे
टॉयलेट में जाकर कपड़े उतारते थे. चरमोत्कर्ष तो तब हुआ जब उसने अपनी निकर भी उतार
दी. पूरे नंग-धड़ंग होकर आँगन को तिरछे पार करता हुआ , रास्ते में नल से मग भरता
हुआ टॉयलेट में घुस गया. पूरे स्कूल में सन्नाटा सा छा गया. तकरीबन 5 मिनटों बाद
सुनील बीच आँगन में लौटा और बिना किसी हिचकिचाहट के कपड़े पहन कर क्लास में आ गया.
हम सभी स्तब्ध होकर ये नज़ारा देख रहे थे. और लड़किया ! 6-7 साल की लड़कियों
से आप क्या अपेक्षा रखते है? हाय की
मिली-जुली आवाज़, खिलखिलाहट और नज़र नीची.
पलक झपकते ही आधे क्लास के बच्चों का हाथ ऊपर उठ गया. एक और लड़के को इज़ाज़त मिली. पर ये
क्या ? तबतक, आँगन 10-12 बच्चों से भर गया था. सभी बीच आंगन में कपड़े उतार रहे
थे. किसी तरह, एक मास्टर ने होशियारी दिखाई और सब बच्चों को डांटकर क्लास में भेज
दिया.
तो ऐसे थे हमारे सुनील जी. पर हम भी किसी से कम नहीं थे.
मेरे दादा के श्राद्ध के समय खूब मिठाई बनी थी. ये मेरे लिए एक नया पर सुखद अनुभव
था. 23 जनवरी 1954 का दिन रहा होगा. तब की दोस्ती में हम दोस्त रूखा-सूखा,
अच्छा सब मिल-बाँट के खाते थे. मैंने अपने कोट की जेब मिठाईयों से भर ली. टिफिन
टाइम में सुनील को मज़ा आ गया. उसके पूछने पर मैंने बताया कि मेरे दादा को अंतिम
विदाई दी जा रही थी.
कोई एक साल भी नहीं बीते होंगे कि सुनील के दादा की भी
मृत्यु हो गयी. तीन दिन बाद जब सुनील स्कूल आया तब पता चला. मैंने उससे पूछ ही
लिया कि अब तो उसकी घर भी मिठाई बनेगी ! और जब बनी तो उसने मुझे बड़े प्यार से
आमंत्रित किया.
दसवी कक्षा में सुनील दूसरे सेक्शन में बैठता था. मेरी
सेक्शन में केमिस्ट्री का कम्बायिंड क्लास करने आता जिसका जिक्र करना आवश्यक है.
क्लास बी एन कॉलेज में डिमोंस्टरेटर रह चुके श्री गणेश प्रसाद लेते थे. क्लास में
१०० लड़कों के बैठने का इंतजाम था , गैलेरिनुमा लकड़ी की सीढ़ियों वाला. सुनील शायद
जानबूझ के सब लड़कों के बैठ जाने और लेक्चर शुरू होने के बाद एंट्री लेता था. दूर
से उसके नाल लगे जूते की आवाज़ आने लगती. पूरी बुलंद आवाज़ में वह “May I come in Sir ?“ बोलता और बिना
इज़ाज़त का इंतज़ार किये पीछे की बेंच पर लकड़ी की सीढ़ी पर पूरी जोर से खटखटाता हुआ
ऊपर जाता. जाहिर है शिक्षक का पूरा रिदम टूट जाता. उसे डांटते- डांटते आखिरकार
शिक्षक भी थक से गए और वे उसकी जूतों की टाप सुनते ही पढाई बंद कर देते.जब सुनील
बैठ जाता तभी पढाई पुनः शुरू होती. सुनील पीछे बैठा-बैठा भी पढाई में विघ्न डालता
रहता. इसलिए उसके लिए गणेश सर ने सामने की सीट रिजर्व कर दी. पर वहाँ भी चैन कहाँ.
कभी ब्लैक-बोर्ड चमकने लगता; कभी कोई पीछे से उसे चाख मार देता और कभी उसके पेन की
स्याही खत्म होजाती और वह सबसे पीछे की बेंच पर बैठे लड़के से पेन मांगने जाता .
उसी तरह, घोड़े के टाप जैसे आवाज़ के साथ.. अंत में, तंग आकर उसे क्लास में आने से
मना कर दिया गया. इसके बाद क्लास में विघ्न डालने का ज़िम्मा शत्रुघ्न सिन्हा ने
सम्हाला.
कभी १९६२-६३ में अजय भैया ने और पाठक ने भी मुझे बताया
कि पटना से सुनील नाम का लड़का एनसीसी सिग्नल के कैंप में आया हुआ था जो “टूटे हुए ख़्वाबों ने“ गाना
बहुत अच्छा गाता था.
सुनील आया. बहुत अच्छा लगा. उसके कुछ महीने बाद, दिसम्बर
2007 में अजय भैया के बड़े लड़के अपूर्व का मेरेज रिसेप्शन था. सुनील से मुलाक़ात हुई। जब मिले तो ज्यादा बातें नहीं हो पायी। रात बहुत हो चुकी थी, देर होने लगी थी।
हाँ ! देर तो हो ही गयी थी. 50 वर्षों के अंतराल में कोडिॅनेट॒स में कई बार कितनी तरह का बदलाव आ जाता है. जिंदगी के पल अगर एक खींची हुई डोर पर अवलंबित रहती तो डोर के संकुचित होने की आशा रहती. मालूम नहीं, वैज्ञानिक स्ट्रिंग परिकल्पना को अमली जामा ज़ल्दी क्यों नहीं पहना रहे ?
हाँ ! देर तो हो ही गयी थी. 50 वर्षों के अंतराल में कोडिॅनेट॒स में कई बार कितनी तरह का बदलाव आ जाता है. जिंदगी के पल अगर एक खींची हुई डोर पर अवलंबित रहती तो डोर के संकुचित होने की आशा रहती. मालूम नहीं, वैज्ञानिक स्ट्रिंग परिकल्पना को अमली जामा ज़ल्दी क्यों नहीं पहना रहे ?
No comments:
Post a Comment